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डिजिटल अरेस्ट के नाम पर 1.55 करोड़ की ठगी, रिटायर्ड महिला डॉक्टर 7 दिन तक रही बंधक जैसी स्थिति में

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देश में साइबर ठगी का बड़ा मामला सामने आया है, जहां डिजिटल अरेस्ट के नाम पर एक रिटायर्ड महिला डॉक्टर से 1.55 करोड़ रुपये ठग लिए गए।

देश में साइबर अपराध के बढ़ते मामलों के बीच एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने आम लोगों की सुरक्षा और जागरूकता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक रिटायर्ड महिला डॉक्टर को साइबर ठगों ने “डिजिटल अरेस्ट” के नाम पर ऐसा जाल बिछाकर फंसाया कि वह सात दिनों तक मानसिक रूप से कैद जैसी स्थिति में रहीं और अंततः 1.55 करोड़ रुपये गंवा बैठीं। ठगों ने खुद को National Investigation Agency (NIA) का अधिकारी बताकर उन्हें डराया-धमकाया और पूरी तरह अपने नियंत्रण में रखा।इस मामले की पीड़िता जिया सुल्ताना बताई जा रही हैं, जो प्रोविंशियल मेडिकल सर्विसेज से सेवानिवृत्त हैं। घटना के समय वह अकेली थीं, जिसका फायदा उठाकर ठगों ने उन्हें अपने जाल में फंसाया। यह मामला इस बात का उदाहरण है कि साइबर अपराधी किस तरह मनोवैज्ञानिक दबाव और डर का इस्तेमाल कर लोगों से बड़ी रकम ठग लेते हैं।

घटना की शुरुआत 11 अप्रैल को एक वीडियो कॉल से हुई। कॉल करने वाले व्यक्ति ने खुद को एक जांच एजेंसी का अधिकारी बताया और बेहद सख्त लहजे में कहा कि उनके आधार कार्ड का इस्तेमाल देशविरोधी गतिविधियों में किया गया है। इस आरोप ने पीड़िता को पूरी तरह डरा दिया। ठग ने उन्हें चेतावनी दी कि अगर उन्होंने किसी को इस बारे में बताया, तो उन्हें तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाएगा। इस तरह उन्होंने डर और गोपनीयता का माहौल बना दिया, जिससे पीड़िता किसी से मदद नहीं मांग सकीं।

इसके बाद ठगों ने अपना खेल और तेज कर दिया। एक दूसरा व्यक्ति सामने आया, जिसने खुद को NIA का वरिष्ठ अधिकारी बताया और पूरी प्रक्रिया को “आंतरिक जांच” का नाम दिया। उसने कहा कि उनके बैंक खातों की जांच जरूरी है और इसके लिए उन्हें लगातार वीडियो कॉल पर बने रहना होगा।

यही वह बिंदु था, जहां से पीड़िता पूरी तरह ठगों के नियंत्रण में आ गईं। उन्हें लगातार वीडियो कॉल पर रखा गया, जिससे वह किसी और से संपर्क न कर सकें। यह रणनीति “डिजिटल अरेस्ट” के रूप में जानी जाती है, जिसमें व्यक्ति को यह महसूस कराया जाता है कि वह किसी जांच एजेंसी की निगरानी में है और उसे हर निर्देश का पालन करना होगा।

अगले सात दिनों तक यही सिलसिला चलता रहा। इस दौरान ठगों ने पीड़िता से उनके बैंक खातों की पूरी जानकारी हासिल कर ली। 11 से 17 अप्रैल के बीच अलग-अलग बहानों से उन्हें पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया गया। कभी कहा गया कि यह “वेरिफिकेशन” के लिए है, तो कभी “सुरक्षा जांच” के नाम पर रकम भेजने को कहा गया।

इस दौरान पीड़िता से चार अलग-अलग खातों में कुल 1.55 करोड़ रुपये ट्रांसफर करा लिए गए। ये सभी ट्रांजैक्शन RTGS के जरिए किए गए, जिससे पैसा तुरंत ठगों तक पहुंच गया। लगातार दबाव और डर के माहौल में पीड़िता को समझ ही नहीं आया कि उनके साथ क्या हो रहा है।

हालांकि, जब ठगों ने और पैसे की मांग शुरू की, तब पीड़िता को शक हुआ। उन्होंने हिम्मत जुटाकर अपने एक करीबी व्यक्ति को पूरी बात बताई। इसके बाद उन्हें एहसास हुआ कि वे एक बड़े साइबर फ्रॉड का शिकार हो चुकी हैं।

मामला सामने आते ही साइबर क्राइम थाने में शिकायत दर्ज कराई गई। पुलिस ने तुरंत जांच शुरू की और जिन खातों में पैसे ट्रांसफर किए गए थे, उन्हें फ्रीज कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी। साथ ही कॉल करने वाले नंबरों की लोकेशन और कॉल डिटेल्स भी खंगाली जा रही हैं।

प्रारंभिक जांच में यह आशंका जताई जा रही है कि यह किसी अंतरराज्यीय साइबर गिरोह का काम हो सकता है, जो इस तरह के संगठित अपराध को अंजाम देता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि “डिजिटल अरेस्ट” जैसे नए तरीके साइबर अपराध की दुनिया में तेजी से फैल रहे हैं। इसमें ठग खुद को पुलिस, CBI या NIA जैसे बड़े संस्थानों का अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं और उन्हें मानसिक रूप से इतना कमजोर कर देते हैं कि वे बिना सोचे-समझे उनके निर्देशों का पालन करने लगते हैं।

यह घटना आम लोगों के लिए एक बड़ी चेतावनी है। किसी भी सरकारी एजेंसी द्वारा इस तरह वीडियो कॉल पर जांच करने या पैसे ट्रांसफर करने के निर्देश नहीं दिए जाते। अगर कोई ऐसा करता है, तो यह साफ तौर पर धोखाधड़ी का संकेत है।

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि ऐसे किसी भी कॉल या मैसेज पर तुरंत भरोसा न करें। अगर कोई खुद को सरकारी अधिकारी बताकर डराने की कोशिश करे, तो उसकी जानकारी की पुष्टि आधिकारिक स्रोत से करें और तुरंत पुलिस या साइबर हेल्पलाइन से संपर्क करें।

यह मामला दिखाता है कि तकनीक जितनी तेजी से आगे बढ़ रही है, अपराधी भी उतनी ही तेजी से नए तरीके अपना रहे हैं। ऐसे में जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव है।

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